Bharat Mein Brahmin Sansadon ki Rajnitik Bhagidari Par Ek Nazar
- Get link
- X
- Other Apps
भारत में राजनीतिक भागीदारी हमेशा से ही समाज के विभिन्न वर्गों की विशेषताओं और इतिहास से प्रभावित रही है। भारतीय समाज विभिन्न जातियों और समुदायों में विभाजित है, और ये जातियां समाज की राजनीतिक व्यवस्था में अपने-अपने ढंग से योगदान करती रही हैं। भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण समुदाय ब्राह्मणों का रहा है, जिनकी भूमिका और भागीदारी लंबे समय से चर्चाओं का विषय रही है। वर्तमान संदर्भ में, यह देखना जरूरी है कि भारत में ब्राह्मण सांसदों की भागीदारी कितनी है, और उनकी राजनीतिक स्थिति क्या है।
ब्राह्मणों का भारतीय राजनीति
में इतिहास
ब्राह्मण भारतीय समाज के सबसे ऊंचे
वर्ण में आते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से, ब्राह्मणों ने भारतीय राजनीति,
धर्म, और संस्कृति में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राचीन भारत में, ब्राह्मणों को समाज का
मार्गदर्शक माना जाता था, और उन्हें शिक्षा,
धर्म और शासन के
क्षेत्र में अग्रणी माना जाता था। हालांकि, आजादी के बाद भारत
के लोकतांत्रिक ढांचे में समाज के विभिन्न वर्गों
को बराबर की भागीदारी दी
गई, लेकिन ब्राह्मण समुदाय ने राजनीति में
अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी।
ब्राह्मण नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम
में भी महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई। मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, और बाल गंगाधर
तिलक जैसे बड़े नेता ब्राह्मण समुदाय से थे, जिन्होंने
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को मजबूत करने
में मदद की। आजादी के बाद भी,
जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी
वाजपेयी जैसे ब्राह्मण नेताओं ने प्रधानमंत्री के
पद पर अपनी छाप
छोड़ी।
स्वतंत्रता के बाद ब्राह्मण
सांसदों की स्थिति
स्वतंत्रता के बाद, भारत
की राजनीतिक व्यवस्था में जातिगत समीकरणों का महत्व और
बढ़ गया। हालांकि संविधान ने जाति-आधारित
भेदभाव को समाप्त करने
की दिशा में काम किया, लेकिन जमीनी हकीकत में जाति का प्रभाव बना
रहा। ब्राह्मण समुदाय ने लंबे समय
तक राजनीति में अपनी प्रभावी स्थिति बनाए रखी। आजादी के पहले कुछ
दशकों में, ब्राह्मण सांसदों की संख्या और
उनकी राजनीतिक भागीदारी उच्च रही।
1950 और 1960 के दशक में
ब्राह्मण नेताओं की भूमिका काफी
महत्वपूर्ण थी। राज्यसभा और लोकसभा में
ब्राह्मण सांसदों की संख्या अधिक
थी, और उनकी नीति
निर्माण में प्रभावी भागीदारी थी। लेकिन 1980 के दशक के
बाद से जाति-आधारित
राजनीति ने एक नया
मोड़ लिया, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति
(एसटी) के नेताओं का
उदय हुआ। इसके परिणामस्वरूप ब्राह्मण सांसदों की संख्या में
धीरे-धीरे कमी आई।
मंडल आयोग और ब्राह्मणों का
राजनीतिक प्रभाव
1980 और 1990 के दशक में
भारतीय राजनीति में मंडल आयोग की सिफारिशों का
महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इसने राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्ग के नेताओं के
उभार को बढ़ावा दिया
और ब्राह्मण समुदाय के पारंपरिक वर्चस्व
को चुनौती दी। मंडल आयोग की सिफारिशों के
बाद आरक्षण की व्यवस्था लागू
हुई, जिससे ओबीसी और अन्य पिछड़े
वर्गों को अधिक प्रतिनिधित्व
मिला।
इस परिवर्तन का सीधा असर
ब्राह्मण सांसदों की संख्या पर
पड़ा। 1990 के दशक से
ब्राह्मण नेताओं की भूमिका और
भागीदारी घटने लगी, और दलित, ओबीसी
और मुस्लिम समुदायों के नेता राजनीति
में अधिक प्रभावशाली हो गए। हालांकि,
इसके बावजूद ब्राह्मण नेता अभी भी कई राजनीतिक दलों में प्रमुख पदों पर बने रहे।
आधुनिक समय में ब्राह्मण सांसदों की भागीदारी
वर्तमान समय में भारतीय राजनीति में जातिगत समीकरण काफी बदल गए हैं। जबकि
पहले ब्राह्मण समुदाय का राजनीति में
वर्चस्व था, अब विभिन्न जातियों
और समुदायों के नेताओं का
उभार देखा जा सकता है।
फिर भी, ब्राह्मण सांसदों की संख्या पूरी
तरह से समाप्त नहीं
हुई है, बल्कि उनका योगदान आज भी महत्वपूर्ण
है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस जैसे
प्रमुख राजनीतिक दलों में कई ब्राह्मण सांसद
और नेता उच्च पदों पर हैं। 2014 और
2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के टिकट पर
कई ब्राह्मण नेता चुने गए। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, और राजस्थान जैसे
प्रमुख राज्यों में ब्राह्मण वोट बैंक महत्वपूर्ण माना जाता है। इन राज्यों में
ब्राह्मण सांसदों की संख्या और
प्रभाव आज भी देखा
जा सकता है, विशेष रूप से भाजपा में।
हालांकि, यह कहना गलत
नहीं होगा कि ब्राह्मण समुदाय
का राजनीति में प्रभाव पहले जितना नहीं रहा। पहले जहाँ ब्राह्मण सांसदों की संख्या अधिक
थी, वहीं अब दलित, ओबीसी
और अन्य जातियों के नेताओं की
बढ़ती भागीदारी के कारण यह
घट गई है। लेकिन
राजनीतिक दलों के लिए ब्राह्मण
वोट बैंक अब भी महत्वपूर्ण
है, और इसे साधने
के लिए कई दल ब्राह्मण
नेताओं को प्रमुख पदों
पर रखते हैं।
राजनीतिक दलों में ब्राह्मणों की भूमिका
भारतीय जनता पार्टी ब्राह्मण समुदाय के समर्थन का
सबसे बड़ा लाभार्थी रही है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों
में भाजपा ने ब्राह्मण समुदाय
को अपने पक्ष में बनाए रखने में सफलता पाई। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार में भी कई ब्राह्मण
नेता प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। इसी प्रकार, कांग्रेस ने भी ब्राह्मण
नेताओं को सदैव महत्वपूर्ण
माना है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी
की राजनीति में सक्रिय भागीदारी के बावजूद कांग्रेस
ने ब्राह्मण नेताओं को उच्च पदों
पर नियुक्त किया है, विशेषकर उत्तर भारत में।
सपा, बसपा, और आरजेडी जैसे
दलों ने भी ब्राह्मण
समुदाय को अपने साथ
जोड़े रखने की कोशिश की
है, हालांकि ये दल मुख्य
रूप से ओबीसी और
दलित वोटरों पर निर्भर करते
हैं। इसके बावजूद, ये दल ब्राह्मण
नेताओं को अपनी पार्टी
में शामिल कर, उन्हें चुनाव में टिकट देकर अपने जातिगत समीकरण को मजबूत करने
की कोशिश करते हैं।
भविष्य की संभावनाएँ
भविष्य में भारतीय राजनीति में ब्राह्मण सांसदों की भागीदारी कैसी
होगी, यह कई कारकों
पर निर्भर करेगा। जातिगत राजनीति के बदलते समीकरणों,
क्षेत्रीय दलों के उभार और
समाज के विभिन्न वर्गों
की मांगों के आधार पर
ब्राह्मण समुदाय की भूमिका में
परिवर्तन हो सकता है।
हालांकि, यह स्पष्ट है
कि ब्राह्मण समुदाय का राजनीति में
योगदान समाप्त नहीं होगा। राजनीतिक दल उन्हें साधने
के प्रयास में जुटे रहेंगे, विशेषकर उन राज्यों में
जहां उनकी जनसंख्या अधिक है।
ब्राह्मण समुदाय के युवा नेता
भी राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर
रहे हैं। यदि उन्हें सही अवसर और मार्गदर्शन मिलता
है, तो ब्राह्मण सांसदों
की संख्या में वृद्धि हो सकती है।
इसके साथ ही, समाज के अन्य वर्गों
के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए ब्राह्मण सांसद भारतीय राजनीति में अपनी जगह बनाए रखने में सक्षम होंगे।
निष्कर्ष
भारत में ब्राह्मण सांसदों की राजनीतिक
भागीदारी का
इतिहास समृद्ध रहा है, लेकिन वर्तमान समय में उनके प्रभाव में कमी आई है। जातिगत
समीकरणों के बदलने के
बावजूद, ब्राह्मण समुदाय का राजनीति में
महत्व बना हुआ है। ब्राह्मण सांसदों की संख्या कम
हो सकती है, लेकिन उनका प्रभाव और राजनीतिक भागीदारी
समाप्त नहीं होगी।
- Get link
- X
- Other Apps
Comments
Post a Comment